Friday, April 8, 2011

पापा मैं अब भी छोटी हूं
जब मैं कक्षा छठीं की छात्रा थी, तेरह नवम्बर के दिन स्कूल में नेहरू जी का चित्र बनाने की स्पर्धा आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए मैडम ने मेरा नाम लिख दिया था, क्योंकि मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। मैंने नेहरू जी का चित्र कभी नहीं बनाया था। मैं प्रतियोगिता में चित्र अच्छा बना सकूं, यह सोचकर मैं पांच दिन पहले से नेहरू जी का चित्र बनाने का अयास कर रहीं थी। अनेक बार चित्र बना चुकी थी। नेहरू जी ठीक-ठाक ही बन रहे थे।
लेकिन एक बात कहूं, मुझे इंसानों की चित्र बनाने में रूचि नहीं थी, चाहे वह नेहरू जी हो या गान्धी जी। हां, पक्षियों के चित्र बनाने में मुझे खूब मजा आता था। चिडियों के चित्र तो मैं ढेरम ढेर बनाती थी। मैं चित्र मैडम को दिखाती, पापा को दिखाती और सबको दिखाती थी। इसी वजह से मैडम ने मुझे स्कूल की प्रतियोगिता में चित्र बनाने के लिए कहा था। मेरा मन नहीं था, लेकिन मैडम ने नाम लिख दिया था तो मना कैसे करती। और फिर पापा भी चाहते थे कि मैं प्रतियोगिता में चित्र बनाऊं।
तेरह नवम्बर की सुबह झटपट तैयार हो गई। सोचा, एक बार नेहरू जी के सारे चित्र जो मैंने बनाए है, पापा को दिखाऊं। पहले भी मैं अपने चित्र बनाकर पापा को दिखाती रहती थी। पापा चित्र में कोई खामी बताते, तो मैं सुधार कर लेती थी। उस दिन भी पापा को चित्र दिखाने के पीछे मन में यहीं बात थी। जब मैंने पापा को नेहरू जी के कई चित्र दिखाए तो पापा बोले, बेटी, तुमने नेहरू जी की नाक सहीं नहीं बनाई है। किसी चित्र में लम्बी नाक बना दी है, तो किसी में बांकी बनाई है। एक चित्र मुझे दिखाकर बोले- अब देखो, इस चित्र में नाक के नकसुर कितने चौड़े कर दिए। मानो नेहरू जी की नाक नहीं पाताल पानी के बोगदे बनाए हो।
उस दिन हाथ में कलर बॉक्स, पेंसिल, स्केल, रबर और शॉर्पनर लेकर तेज कदमों से स्कूल की ओर चल पड़ी थी। पूरे रास्ते दिमाग में चित्र के बारे में सोचती चल रहीं थी। पापा की बातों को ध्यान में रखकर मन ही मन बुदबुदाई थी- सबसे पहले नाक बनाऊंगी। एकदम सीधी और सुन्दर नाक। नेहरू जी की नाक, मेरे चित्रों में बनी नाक की तरह कभी आड़ी-तिरछी तो न रहीं होगी। जब नाक ठीक-ठाक बन जाएगी, तब आंखे, होंठ लम्बा काला कोट, चूड़ीदार पजामा, कोट पर ताजा लाल गुलाब और आखिरी में टोपी बनाऊ¡गी। पूरे रास्ते अपनी नन्हीं-नन्हीं अंगुलियों से हवा में नेहरू जी की नाक बनाने का अयास करती जा रहीं थी। मानो हवा में मेरे लिए एक बड़ी-सी कागज की खाली शीट टंगी थी। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती, शीट भी आगे बढ़ जाती थी।
प्रतियोगिता ठीक समय पर शुरू हो गई। सब कागज पेंसिल निकालकर तैयार थे। घण्टी बजते ही मैं नेहरू जी की नाक बनाने लगी। मैंने देखा, नाक की बजाय मैंने बाज की चोंच बना दी। पापा की बात याद आई गई। मैं चुपचाप हंसी। फिर झट से रबर निकाला और चोंच मिटाकर नाक बनाई। अब की जो नाक बनी थी, उतनी अच्छी तो मैंने नेहरू जी की किसी तस्वीर में भी नहीं देखी थी। मैं नेहरू जी की नाक को सुन्दर बनाकर मन ही मन खुश हुई थी। मैंने अपने आजू-बाजू देखा, बांई बगल में बैठी लड़की ने शीट पर आउट लाइन बनाई थी। दांई बाजू बैठी लड़की ने शीट के कोने पर अपना नाम लिख था और टोपी बना रहीं थी। मैंने सोचा, सबसे पहले सबसे पहले नेहरू जी का चेहरा ही बनाऊं। नाक तो बन गई है, अब बचता क्या है। दो आंखें, होंठ और भौगें। मैं बनाने में जुट गई थी। नेहरू जी की टोपी बनाते हुए, मन में सवाल उठा कि नेहरू जी का सिर गान्धी जी के सिर की तरह गञ्जा था या बाल वाला। मैंने कभी बगैर टोपी के नेहरू जी की तस्वीर नहीं देखी थी। सोचा, मैडम से पुछू । मैडम जब टहलती हुई मेरी तरफ आई तो मैंने खड़ी पूछ ही लिया। मैडम ने अपने होंठो पर अंगुली रखी और फिर आंखे दिखाकर मुझे बैठने का इशारा किया। मैं बैठ गई। मन ही मन बुदबुदाई, पापा से पूछूंगी। पापा को तो सब पता होता है। मैं फिर चित्र बनाने में लग गई थी। तभी मेरा ध्यान एक बार अपनी अगल-बगल वाली की ओर चला गया। मैंने देखा दांई बाजू वाली नेहरू जी का चूड़ीदार पजामा बना रही थी। मुझे लगा कि वह कुछ ज्यादा ही तंग पजामा बना रहीं थी। बांई बाजू वाली नेहरू जी के कोट पर लगा तो रहीं थी गुलाब ही, पर वह गोभी के फूल की तरह दिख रहा था। लाल गोभी- मन ही मन बोलकर मैं मुस्कुराई थी। मुस्कुराते हुए थोड़ी झेम्पी कि मैडम न देख लें। मैंने बाज की आंखों को थोड़ी बड़ी बनाकर नेहरू जी के चेहरे में लगा दी थी।
मैंने खूब आराम से चित्र बनाया, फिर भी 15 मिनट पहले बन गया था। आजू-बाजू वाली लड़कियां अब भी मैडम से कुछ समय की गुजारिश कर रहीं थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वे आखिर ऐसा क्या बना रहीं थी।
हम सब लड़कियां मैन्दान में थी। चटक धूप थी। ठण्ड उस दिन ज्यादा नहीं थी पर धूप अच्छी लग रहीं थी। मैं झूला झूल रहीं थी। कुछ लड़कियां तितलियां पकड़ने की कोशिश कर रहीं थी। उन्हें शायद तितली पसन्द थी। मुझे चिड़िया पसन्द थी। मैंने सोचा- कितना अच्छा होता, अगर हमें स्पर्धा में अपनी पसन्द के चित्र बनाने को कहा गया होता। ये बड़े लोग ऐसी स्पर्धाएं ही क्यों आयोजित करते है जिसमें बच्चे अपनी पसन्द के मुताबिक चित्र न बना पाए। मैं उदास हो गई। फिर सोचा, घर जाकर चिड़िया बनाऊंगी। उड़ती चिड़िया, जो अपनी मर्जी से उडे़गी। अपनी मन चाही दिशा में उड़ेगी और मन चाहे पेड़ पर बैठेगी। कुछ देर बाद मैदान में मैडम आई। सभी बच्चो ने उन्हें घेर लिया। मैडम ने इशारे से मुझे बुलाया और बोली- हमनें सभी चित्र देख लिए है। दक्षा ने नेहरू जी का चित्र सबसे अच्छा बनाया है। कल चौदह नवम्बर है। चाचा नेहरू का जन्मदिन। सेण्ट पेण्टि्रक्स स्कूल में चित्रकला की प्रतियोगिता है। शहर के सभी स्कूलों के बच्चे उसमें भाग लेंगे। दक्षा भी हमारे स्कूल की तरफ से उसमें भाग लेने जाएगी।
मैडम की बात सुनकर मैं परेशान हो गई। मैं उनसे कहना चाह रहीं थी कि मुझे प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना है। मुझे नेहरू जी को बार-बार बनाना अच्छा नहीं लगता है। मुझे तो चिड़िया बनाना पसन्द है। पर मैडम के होंठ पर अंगुली रखने व आंखों के इशारे से मैं सहम जाती थी। अपनी बात कहने का साहस जुटा पाती, उसके पहले ही मैडम बोली- दक्षा तुम कल ठीक 9 बजे सेण्ट पेटि्रक्स स्कूल पहुच जाना। देर मत करना। स्कूल देखा है न, अगर नहीं तो अपने घर से किसी को छुड़वाने ले आना। मैं वहीं मिलूंगी।
मैंने घर पहुंचकर पाप को सारी बातें बताई। पापा खुश हुए। मैंने उन्हें कहा कि आप मुझे छोड़ने चलना। मैं अकेली वहां नहीं जा सकूंगी।
क्यों नहीं जा सकोगी- पापा बोले। उनकी आवाज में रूखाई थी। वे बोले- बस, तिलक पार्क के आगे तो है स्कूल। तुहें मैडम को बताना था कि तुम नहीं आ सकोगी। वे कुछ व्यवस्था करती। मुझे तो ऑफीस में जरूरी काम है।
पापा मुझे कुछ चिन्ता में लगे थे। उन दिनों पापा कुछ ज्यादा ही चिन्ता में रहते थे। बात-बात में चिड़चिड़ करते थे। मुझे गोदी में भी नहीं उठाते थे। मैं कभी कहती तो जवाब देते- तुम बड़ी हो गई हो। पैदल चलो। छठी कक्षा की लड़की क्या इतनी बड़ी हो जाती है कि पापा उसे गोदी में नहीं उठा सकते। मुझे कभी-कभी पापा की बातों से डर लगता था। घर में मेरी ममी से ही पटती थी। उस दिन भी ममी ने मुझे हिमत बन्धाई और और कहा कि सुबह अगर ज्यादा काम नहीं होता तो वे ही मुझे छोड़ने जाती। मेरा मन उनके जवाब से खिन्न हो गया। गुस्सा भी आ रही था। मैंने भी ताव में आकर पापा से कह दिया- आप छोड़ने नहीं चल सकते तो मैं खुद चली जाऊंगी। मैं छोटी ब\"ाी नहीं हूं, बड़ी हो गई हो। आप कॉपी में नक्शा बना दो, मैं नक्शा देखती, पूछती चली जाऊंगी।
पापा ने मेरी बातें सुनकर मुझे पास बुलाया और बोले- सचमुच मेरी बेटी बड़ी हो रहीं है। अपना काम खुद करने की सोच रहीं है।
उस रात जब पापा से नक्शा समझकर मैं सोई तो जाने कब सपनों में वह रास्ता उतर आया। मैं मजे से अपनी साइकिल पर सवार होकर स्कूल पहुंच गई थी। मैंने फिर से बढ़ीया चित्र बनाया था। मंच पर मेरा नाम पुकारा गया था और प्रथम पुरस्कार में मुझे साइकिल भी मिल गई थी। मैं खुश थी नई साइकल पाकर।
अचानक कर्कश अलार्म ने मेरा सपना चीर डाला। मैं भुनभुनाई, पापा से कितनी बार कहा कि अच्छी धुन वाला अलार्म ला दो या ममी तुम ही जगा दिया करो। लेकिन वो है कि सुनते ही नहीं। काश मुझे पुरस्कार में अलार्म घड़ी मिल जाए जो मुझे चिçड़यों की चू...चू की आवाज से जगाए।
मैं उठकर फटाफट तैयार होने लगी थी। साइकिल साफ की और कपॉस बॉक्स चैक किया। पौने आठ के आसपास मैं अपनी साइकिल पर सवार होकर निकल पड़ी थी। नौ बजे से परीक्षा थी। हमेशा की तरह ममी दरवाजे तक मुझे टाटा करने आई थी।
साइकिल चलाते हुए मैं तिलक पार्क और किराना दुकान तक तो आराम से पहुंच गई थी। लेकिन फिर सोचा कि आगे के रास्ते के लिए नक्शा देख लूं। जब कपास खोला तो ध्यान आया कि नक्शा तो घर पर ही भूल गई। अब क्या करूं? घर जाकर नक्शा लाऊंगी तो प्रतियोगिता का समय निकल जाएगा। मेरी साइकिल की चाल अपने आप धीमी हो गई। पापा की बातें याद करने लगी। उन्होंने कहा था कि दुकान के बाद एक तिराहा आएगा, लेकिन यहां तो चौराहा है। हालांकि एक रास्ता थोड़ा संकरा है। हो सकता है कि पापा ने उसे गिना ही न हो। मैं परेशान हुई फिर सहेलियों वाला खेल याद आया। मैंने अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ... कहते हुए एक रास्ता को चुना और उस पर भगवान का नाम लेकर चल दी। आगे जाकर देखा तो रास्ता बेहद सुनसान था। मैं घबरा गई। वापस पलटकर तेजी से साइकल चलाने लगी तो स्कूटर से टकरा गई और गिर गई। गिरने से दीदी की हाथ घड़ी का कांच घिस गया। मैं बड़बड़ाई- अब दीदी डाण्टेगी। मुझे चुपके से उनकी घड़ी नहीं पहननी चाहिए थी। काश इनाम में मुझे हाथ घड़ी मिल जाए। मैं वह दीदी को दे दूंगी, फिर वह नहीं डाण्टेगी। पर अब स्कूल कैसे पहुंचू। आसपास तो कोई दिख भी नहीं रहा कि उससे रास्ता पूछूं। मुझे पापा पर बहुत गुस्सा आया। मैडम को भी मैंने जीभर कोसा था, वह मेरी कॉलोनी तरफ से ही आती है फिर भी मुझे साथ नहीं ला सकी। लेकिन इन सबका क्या कसूर। मेरी ही गलती थी। मैंने स्कूल में नेहरू जी का चित्र अच्छा क्यों बनाया, जबकि वे मुझे अच्छे नहीं लगते।
मैंने साइकिल उठाई और जिस तरफ से आई थी, उसी तिराहे की ओर चल दी। वहां पहुंची तो पानी-पुरी वाला ढेला दिखा। ये वहीं अंकल थे जो हमारे स्कूल के सामने खड़े रहते थे। मैंने सोचा कि अंकल से रास्ता पुंछू। फिर सोचा कि वे क्या कहेंगे, इतनी बड़ी लड़की रास्ता भूल गई। मैंने घड़ी देखी। यह टाइम अ¡कल का हमारे स्कूल के सामने खड़े होने का था। मैं उनके पीछे-पीछे बिना बताए चलने लगी। करीब पन्द्रह मिनट बाद मुझे अपना जाना-पहचाना रास्ता मिल ही गया। मैं तेज साइकल चलाई फुर्र....और घर पहुंच गई। जब शाम को पापा घर आए तो उन्होंने पूछा- ठीक से स्कूल पहुंच गई थी, चित्र अच्छा बनाया कि नहीं? मैंने पापा की बातों का कोई जवाब नहीं दिया। बस दौड़कर उनसे लिपट गई और उनके पेट में मुंह घुसाकर रोते हुए बोली- पापा मैं अभी बहुत छोटी हूं। मैं जिद करूं तो भी मुझे अकेले मत भेजा करो। पापा हंसते हुए बोले- सचमुच मेरी बेटी अब बड़ी और समझदार हो गई है।

4 comments:

  1. bahut acchi laghu katha... mans patal pe chitrit bachpan ki yaadein taza kar gayi...dil ko chhooti huyi...
    Abhaar.

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  2. नमस्कार जी
    जब आपने चित्र बनाया था तो यहां भी लगा देते हम भी देख लेते ना

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  3. खुबसूरत लम्हों और एहसासों को दर्शाता सुन्दर लेख |

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  4. शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो टिप्पणी करने में आसानी होगी ..धन्यवाद
    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया

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